सच्ची लगन

sachi lagan

कक्षा में अध्यापक बच्चों को महापुरुषों के जीवन के विषय में बता रहे थे। उन्होंने कई वीरों, शहीदों, वैज्ञानिकों एवं नेताओं के रोचक प्रसंग सुनाए। अंत में उन्होंने पूछा- "बच्चो, तुम बड़े होकर क्या बनोगे?''

मनीष सबसे आगे बैठा था। वह बोला, "गुरु जी, मैं तो डॉक्टर बनूँगा। गाँव के गरीब और बीमार लोगों का इलाज ) करूंगा। मेरा अपना दवाखाना होगा। मैं उसमें गरीबों का मुफ़्त इलाज करूँगा।"

गुरु जी यह सुनकर बहुत खुश हुए। बोले, " जीते रहो बेटा, तुम्हारे विचार बहुत ऊँचे हैं। तुम ज़रूर देश की सेवा करोगे।"

फिर उन्होंने सलीम से पूछा, "तुम क्या बनोगे?'' सलीम ने कहा, "गुरु जी, मैं तो इंजीनियर बनूँगा। मेरे पिता जी भी इंजीनियर हैं। वे कहते हैं. आजकल हमारे देश को कल-कारखानों को बड़ी जरूरत है। मैं नए-नए यंत्र बनाऊँगा। कारखानों में काम करूंगा। देश को समृद्ध बनाऊँगा।"

गुरु जी ने कहा, "शाबाश सलीम, तुम ज़रूर एक होशियार इंजीनियर बनोगे तुम्हें मन लगाकर अपनी पढ़ाई करनी चाहिए।" फिर गुरु जी ने पारुल से पूछा, "बेटी. तुम क्या बनोगी?" पारुल शरमा गई। धीरे से बोली, "गुरु जी. मैं तो शिक्षिका बनूँगी। जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, उन्हें पढ़ाऊँगी।"

गुरु जी ने कहा, "आज देश को अच्छे शिक्षक-शिक्षिकाओं की बहुत जरूरत है। लड़कियों के लिए शिक्षिका बनना अच्छा है। वे बहुत प्रेम और धीरज से बालकों को पढ़ा सकती हैं। ज़रूर बेटी, तुम विद्या का दान देकर अच्छे नागरिक बना सकती हो।" अंत में गुरु जी ने पूछा, "वैभव,

तुम क्या बनोगे?" पहले तो वैभव सोच में पड़ गया। कि वह क्या कहे, क्या न कहे ? फिर साहस करके बोला, "गुरु जी, मैं तो समाज सेवक बनूँगा। लोगों की सेवा करूँगा। जनता चाहेगी तो चुनाव लड्रॅगा और जीत गया तो मंत्री बनूँगा और देश की तन-मन से सेवा करूँगा। नहीं जीता, फिर भी जनता की सेवा तो करूँगा ही। " 

गुरु जी वैभव की बात सुनकर बोले, “तुम ज़रूर नेता बनोगे।" फिर गुरु जी ने सारी कक्षा से कहा- "जो लोग अपने-अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम करते हैं, उन्हें अवश्य सफलता मिलती है। सच्ची लगन से मेहनत करने वाले की इच्छा अवश्य पूरी होती है। याद रखो - परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।"

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