रबड़ की कहानी

रबड़ की कहानी

बरसात के दिन थे। चमड़े के जूते पानी में खराब न हो जाएँ इसलिए पिता जी ने कमल के लिए रबड़ के जूते खरीदे। एक बरसाती भी ले आए. जो रबड़ की बनी हुई थी। पेंसिल का लिखा मिटाने के लिए एक रबड़ और खेलने की एक गेंद भी खरीद लाए। रबड़ की इतनी सारी वस्तुएँ पाकर कमल के आनंद का पार न रहा। वह गुब्बारे सा फूल उठा।

वह दौड़ता हुआ अपनी माँ के पास गया और बोला, "देखो माँ पिता जी रबड़ की कितनी सारी चीजें लाए हैं। माँ ! क्या रबड़ का पेड़ होता है, जिस पर ये सब चीजें लगती हैं?"


पिता जी हँसते हुए कमरे में आए और बोले, "हाँ बेटा, रबड़ का पेड़ होता है परंतु ये सब वस्तुएँ उस पेड़ पर नहीं लगतीं, ये तो कारखानों में बनती हैं। रबड़ के पेड़ से एक प्रकार का दूध निकलता है।


"रबड़ के पेड़ से दूध!" कमल चौंककर बोला।


"हाँ पहले पेड़ के तने में कई छेद किए जाते हैं और उनके नीचे टीन की बाल्टियाँ बरतन लटका दी जाती हैं। दिनभर में एक पेड़ से लगभग दो-तीन किलो दूध निकलता है। फिर सब दूध इकट्ठा करते हैं और पानी में डालकर उबालते हैं। इससे रबड़ बरतन में नीचे बैठ जाता है। उसे मशीनों द्वारा सुखा लेते हैं और कारखानों में उससे इच्छा के अनुसार चीजें बनाते हैं।" माँ ने कमल की बात का उत्तर देते हुए बताया। पिता जी ने कहा, "रबड़ से कई वस्तुएँ बनती हैं। साइकिलों और मोटर गाड़ियों के टायर-ट्यूब, जूते, बरसातियाँ, नलियाँ, बिजली के तारों के खोल, खिलौने, गेंद, गुब्बारे आदि सब वस्तुएँ रबड़ से बनती हैं। "


कमल ने पूछा, “पिता जी, ये सब वस्तुएँ रबड़ से क्यों बनती हैं ? " पिता जी ने कहा, "बेटा, रबड़ बहुत उपयोगी पदार्थ है। इसके कई गुण हैं। यह लचीला, हलका और सिकुड़ने फैलने वाला पदार्थ है। इस पर पानी का असर नहीं होता। इसमें से हवा भी नहीं निकलती। इससे बिजली के झटके नहीं लगते। आजकल जहाँ देखो, वहाँ रबड़ की वस्तुएँ दिखाई देती हैं। रबड़ की माँग को पूरा करने के लिए अब तो नकली रबड़ भी बनाया जाता है।" रबड़ के पेड़ से रबड़ की वस्तुएँ कैसे बनती हैं।


कमल को अब पता लगा कि रबड़ के पेड़ से रबड़ की वस्तुएँ कैसे बनती हैं।


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