एक गाँव में विशालकाय आम का पेड़ था। उस पेड़ पर बहुत ही रसीले आम लगते थे लेकिन बच्चे थे कि आम को पकने से पहले ही तोड़कर खा लेते थे। बेचारा पेड़ मन मसोसकर रह जाता। बच्चे आए दिन पेड़ की शाखाओं पर चढ़ते और कच्ची अमियाँ खाने के चक्कर में कई कमजोर डालियाँ तोड़ डालते।
आम का पेड़ सोचता कि वे पेड़ अच्छे हैं, जिन पर कोई फल नहीं लगते। कम से कम वे चैन से तो रहते हैं।
एक दिन की बात है। आम का पेड़ उदास था। हवा ने उससे पूछा, "क्यों भाई! क्या बात है? लगता है, काफ़ी परेशान हो।'
पेड़ बोला, "हवा बहिन । क्या बताऊँ ? काश! मैं भी तुम्हारी तरह चल फिर सकता। यहाँ खड़े-खड़े तो मैं तंग आ गया हूँ। अच्छा होता, मैं दूर किसी घने जंगल में उगा होता!"
हवा ने सुना, तो हैरान हो गई मगर चुप रही। पेड़ ने कहा, “आबादी के पास हम फलदार वृक्षों का खड़ा रहना ही बेकार है। मुझे देखो! मैंने अब तक अपनी काया में पके हुए फल तक नहीं देखे। ये इनसानों के बच्चे फलों के पकने का भी इंतज़ार नहीं करते। देखो न, गाँव के बच्चों ने मुझ पर चढ़-चढ़कर मेरे अंगों का क्या हाल बना दिया है। कई टहनियों और पत्तों को तोड़ डाला है।"
हवा मुसकराई। फिर पेड़ से बोली, “पेड़ भाई! दूर के ढोल सुहावने होते हैं। जंगल में फलदार वृक्ष तो बहुत दुखी हैं। मुझे तो उनकी हालत पर तरस आता है।"
"जंगल में फलदार वृक्ष बहुत दुखी हैं। हवा बहिन! तुम मज़ाक तो नहीं कर रहीं?" पेड़ ने चौंकते हुए पूछा। "
और नहीं तो क्या? जंगल के फलदार पेड़ अपने ही शरीर फलों से परेशान रहते हैं। पेड़ों में फल बड़ी संख्या में लगते हैं। वहाँ फलों को खाने वाला तो दूर तोड़ने वाला भी नहीं होता! पक्षी कितने फल खा पाते हैं? फल पेड़ पर ही पकते हैं! पेड़ बेचारे अपने ही फलों का वजन नहीं सँभाल पाते। फलों का बोझ सहते सहते पेड़ का सारा बदन दुखता रहता है। जब फल पककर गिर जाते हैं, तभी जंगल के पेड़ों को राहत मिलती है। यही नहीं, ढेर सारे पके हुए फल पेड़ के इर्द-गिर्द गिरकर सड़ते हैं। पेड़ बेचारे अपने ही फलों की सड़ांध में चुपचाप खड़े रहते हैं।" हवा ने बताया।
“अच्छा बहिन । मैं ऐसे ही ठीक हूँ। मेरे फल इतने मीठे हैं, तभी तो बच्चे उनका पकने का इंतजार नहीं करते। अरे हाँ, याद आया... पतझड़ के मौसम में ये बच्चे तो मेरे पास फटकते भी नहीं हैं, उन दिनों मैं परेशान हो जाता हूँ। रही बात मेरी टहनियों और पत्तों की, वसंत आते ही मेरे कोमल अंग उग आते हैं।" आम के पेड़ ने हवा से कहा।
हवा मुसकराते हुए आगे बढ़ गई। पेड़ ने मन ही मन हवा का धन्यवाद दिया और खुशी से झूमने लगा।

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