कछुआ और खरगोश की कहानी

कछुआ और खरगोश की कहानी

किसी जंगल में एक खरगोश रहता था। उसे अपनी तेज़ चाल पर बहुत घमंड था। दूसरे जानवरों के सामने वह अपनी तेज़ चाल की डींगें हाँका करता था।

एक दिन तालाब के किनारे उसे एक कछुआ मिला। कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था। उसे देखकर खरगोश को हँसी आ गई। वह बोला, "अरे " बहुत तेज़ चलते हो!" कछुए भाई,


कछुए ने शांति से उत्तर दिया, "भैया खरगोश! तुम्हें अपनी चाल पर ज्यादा घमंड नहीं करना चाहिए।"


खरगोश ने अकड़कर कहा, अरे चुप रह कछुए! मुझे उपदेश देता है?


घिसट-घिसटकर चलता है और मेरे सामने बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है। जानता है, इस जंगल में मेरे जैसा तेज़ कोई भी नहीं दौड़ सकता।"


कछुए ने हँसते हुए कहा, "ठीक है, तुम्हारी और मेरी दौड़ हो जाए। यदि मैं हार गया, तो इस तालाब को छोड़कर चला जाऊँगा और यदि तुम हार गए. तो इस जंगल को छोड़कर कहीं और चले जाना। "


खरगोश ने मूँछों पर ताव देते हुए कहा. "ठीक है, आज तुझे भी पता चल जाएगा कि तू किससे बराबरी कर रहा है!


दोनों की दौड़ तय हुई। लोमड़ी पंच बनी। जंगल के सभी पशु-पक्षी इस अद्भुत दौड़ को देखने के लिए इकट्ठा हुए। खरगोश और कछुए को पहाड़ी पर स्थित एक वृक्ष तक दौड़ना था।


लोमड़ी ने वृक्ष के पास जाकर हाथ ऊँचा करके झंडी दिखाई- एक, दो, तीन ।


और दोनों की दौड़ शुरू हुई। खरगोश छलाँग लगाता हुआ जल्दी ही पहाड़ी पर आ गया। उसने पीछे मुड़कर देखा बेचारा कछुआ धीरे-धीरे चला आ रहा है। वह मन ही मन हँसा और बोला, "मूर्ख, इसी चाल के बल पर मुझसे बराबरी करने चला था। खैर, इस तरह तो यह दोपहर के पहले पहाड़ी पर नहीं चढ़ सकता। अच्छा है, मैं थोड़ी देर इस झाड़ी में आराम कर लूँ। वृक्ष तो यह सामने रहा। जब चाहूँगा, पहुँच जाऊँगा।"


खरगोश यह कहकर वहीं झाड़ी में लेट गया। कछुआ बिना रुके धीरे-धीरे रेंगता हुआ आगे बढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद तो वह सोते हुए खरगोश को भी पार करके आगे बढ़ गया। वह बिना रुके लगातार चलता जा रहा था। अंत में वह वृक्ष के पास जाकर रुका।


सभी पशु-पक्षियों ने हर्षनाद करके उसका स्वागत किया। इस आवाज़ से खरगोश की नींद खुल गई। वह भागा-भागा वृक्ष तक आया परंतु तब तक विजय का सेहरा कछुए के माथे पर बँध चुका था। लोमड़ी ने उसको विजयी घोषित कर दिया था।


घमंडी खरगोश बहुत ही लज्जित हुआ और उस जंगल को छोड़कर भाग गया।

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